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56/84 श्री रेवन्तेश्वर महादेव
56/84 श्री रेवन्तेश्वर महादेव
सूर्य के तेज को न सहन कर पाने के कारण उनकी पत्नी संज्ञा उन्हें छोड कर चली गईं और तप करने लगीं। यह बात सूर्य को पता चली तो वे कुरूक्षेत्र पहुँच गये। यहाँ संज्ञा को सूर्य ने घोड़ी के रूप में देखा। तब वह भगवान के सामने गईं और नासिका से अष्विनी कुमार नामक घोड़े के मुख वाले पुत्र को जन्म दिया। रेत से रेवन्त पुत्र खड्ग और तलवार लेकर उत्पन्न हुआ। बाल्य काल में ही उसने तीनों लोक जीत लिये। सभी देवता घबरा कर ब्रम्हा की शरण में गए। ब्रम्हा ने सभी देवताओं को षिवजी के पास भेज दिया। देवताओं ने षिवजी से कहा कि अष्विनी कुमार के तेज के कारण सारी सृष्टि जल रही है। आप उनकी रक्षा करें। षिवजी ने अष्विनी कुमार का स्मरण किया और अष्विनी कुमार षिवजी के पास आ गया। षिवजी ने प्यार से उसे गोद में बैठाया और उससे कहा कि तुम महाकाल वन में कंटेष्वर के पूर्व में स्थित एक उत्तम लिंग है और तुम उसका पूजन और दर्षन करो और वहीं निवास करो। देवता तुम्हारा पूजन करेंगे और तुम राजाओं के राजा होगे। अष्विनी कुमार षिवजी की आज्ञा से महाकाल वन में आया और वहां आकर षिवलिंग का पूजन किया। रेवन्त के पूजन के कारण षिवलिंग रेवन्तेष्वर महादेव के नाम से विख्यात हुआ। मान्यता है कि जो मनुष्य षिवलिंग के दर्षन कर पूजन करता है उसकी पीढियों को सुख मिलता है तथा अन्त काल में स्वर्ग में वास करता है।